शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

यहाँ है आधा शिव आधा पारवती रूप शिवलिंग भगवान् अर्धनारीश्वर शिवलिंग


हिमाचल प्रदेश की भूमि को देवभूमि कहा जाता है यहाँ पर बहुत से आस्था के केंदर बिद्यमान है हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के इन्दोरा उपमंडल में काठगढ़ महदेव का मंदिर स्थित है यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग ऐसे सवरूप में विद्यमान है जो दो भागों में बंटे हुए हैं अर्थात माँ पारवती और भगवान् शिव के दो विभिन्न रूपों को ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार इनके दोनों भागों के मध्य का अन्तेर घटता बढता रहता है ग्रीषम ऋतू में यह सवरूप दो भागो में बंट जाता है और शीत ऋतू में पुन एक रूप धरण कर लेता है

शिव पुराण की विदेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारम्भ में एक बार ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दिव्यास्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुत हो उठे ये भयंकर स्थिति देख शिव संह्सा वहां आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तम्ब के रूप में प्रकट हुए जिससे दोनों देवताओं के अस्त्र स्वंय ही शांत हो गए

ब्रह्मा और विष्णु दोनों उस स्तम्भ के आदि अंत का मूल जानने के लिए जुट गए विष्णु शुक्र का रूप धरकर पातळ गए मगर अंत ना पा सके ब्रह्मा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले मै स्तम्भ का अंत खोज लाया हूँ जिसके ऊपर ये केतकी का फूल है

ब्रह्मा का ये छल देखकर भगवान् शंकर वहां प्रकट हुए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए तब शंकर ने कहा आप दोनों सामान हो पर ब्रह्मा के कपट के कारण उनकी पूजा नहीं होगी तभी से ब्रह्मा की पूजा अर्चना नहीं की जाती जिस स्तम्भ में शिव प्रकट हुए थे उसी स्तम्भ के अंश के रूप में इसे काठगढ़ महादेव के रूप में पूजा जाने लगा


एतिहासिक महत्व विश्वविजेता सिकंदर ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब पंजाब पहुंचा तो परवेश से पूर्व मीरथल नामक स्थान में 5000 सैनिको को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी इस स्थान पर उसने देखा की एक फ़कीर शिवलिंग की पूजा में व्यस्त था

उसने फ़कीर से कहा की आप मेरे साथ यूनान चलें मैं आपको दुनिया का हर एश्वर्या दूंगा फ़कीर ने सिकंदर की बात को अनसुना करते हुए कहा की आप थोडा पिशे हट जाएँ और सूर्य का परकाश मेरे तक आने दें फ़कीर की इस बात से परभावित होकर सिकंदर ने टाइल पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई इस चारदीवारी के व्यास नदी की और अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए जो आज भी यहाँ पर स्थिक हैं

दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अन्तेर ग्रहों एंव नक्षत्रों के अनुसार घटता बढता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता है ये पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले भूरे रंग का है शिव रूप में पूजे जाते इस शिवलिंग की उंचाई 7 से 8 फुट है जबकि माँ पार्वती के रूप में आराध्य हिस्सा 5 से 6 फुट ऊँचा है

भरत की प्रिय पूज्य स्थली मान्यता है की त्रेता युग में भगवान् राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकई देश यानी की आज के कश्मीर जाते थे तो रास्ते में पड़ते काठगढ़ महादेव के मंदिर में पूजा अर्चना किया करते थे

शिवरात्रि के त्यौहार पर पर्तेयक वर्ष यहाँ पर तीन दिव्सयी भरी मेला लगता है शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर सवरूप के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दुखों का अंत होता है
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