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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गोरी को 17 वार हराने वाले और माफ करने वाले पृथ्वीराज के साथ आखिर मे क्या हुआ था .चार भाष चौबीस गज अंगुल हस्त प्रमाण, त ऊपर सुल्तान है अब मत चुके चौहान"............


सम्राट श्री पृथ्वीराज चौहान
पूरा नाम:-चहुदीश आण चक्रवर्ती महान सम्राट श्री
पृथ्वीराज चौहान,
जन्म तिथि:-7 जुन 1148ईं
पुण्यतिथि:-15 मार्च 1206ईं
जन्म भूमि:-किला तारागढ, अजमेर, राजस्थान।
शासन काल:-1166ईं से 1192ईं तक,
राज्य:- राजस्थान,मध्य प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के कई ईलाको तक शासन.  दिल्ली के अंतिम दिल्ली के अंतिम स्नातनी हिंदू शासक
राजधानी:-अजमेर और दिल्ली,
धार्मिक मन्यता:-सनातन धर्म,हिंदू
वंश:-क्षत्रियराजवंश चौहान
युद्ध:-तराइन ,और कई महत्वपूर्ण युद्ध
शासन अवधि:-27 वर्ष,
पिता:-महाराज सोमेश्वर राज चौहान,
माता:-कर्पूरी देवी,
पत्नी:-महारानी संयोगीता, इंदिरावती,शाशीव्रिता, इच्छनकुमारी,

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महत्वपूर्ण जानकारी पृथ्वीराज चौहान के बारे में:-
12वर्ष की आयु में घने जंगल में खुंखार शेर को बिना किसी
कि सहायता और हथियार के मारने वाला वीर बालक
पृथ्वीराज चौहान है।
13वर्ष कि आयु में पिता का साया सर से हठ गया बचपन में
पिता के मरने के बाद बहुत संघर्ष किया और अखंड
हिन्दुस्तान पर राजपूती प्रचम लहराने वाला वीर बालक
पृथ्वीराज चौहान है।
पिता कि मृत्यु के बदला लेने का और राजपाठ का त्याग
करने का प्रण लेने वाला वीर बालक पृथ्वीराज चौहान है।
15वर्ष की आयु में अजमेर और आस पास कि रियासतो को
संभालने वाला वीर बालक पृथ्वीराज चौहान है।
16वर्ष कि आयु मे दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाला वीर
बालक पृथ्वीराज चौहान है।
भगवान श्री कृष्ण के गीता ज्ञान को मानने वाला और
राम जी कि तरहा अपने माता पिता कि आज्ञा का
पालन करने वाला बालक पृथ्वीराज चौहान है।
अखंड हिन्दुस्तान में एकता, अखंडता, शांतिप्रिय,
न्यायप्रिय, दयालु, दानवीर और प्रजापालक वो सम्राट
पृथ्वीराज चौहान है।
हाथी आदिभयंकर पर बैठकर बड़े-बड़े सुरमाओ को मट्टी
मिलाने वाला और घोड़े नटरम्भा पर बैठकर वायु के वेग से
पलक झपकते दुश्मन के किले दिवारो को पार करने वाला
वो धरती का वीर योद्धा पृथ्वीराज चौहान है।
युद्ध कोशल और शुरवीरता के चर्चे सारे जग मे प्रसिद्ध थे
जिस कारण पृथ्वीराज चौहान को चक्रवर्ती सम्राट,
धरती का वीर योद्धा और राय पिथोरा कि
उपाधियो से सम्मानित किया गया है।
युद्ध की 12 कलाओ में और शब्द भेदी बाण चलाने में निपुर्ण थे पृथ्वीराज चौहान।

तराईन का पहला युद्ध (1191)...

मुहम्मद गोरी ने 1186 में गजनवी वंश के अंतिम शासक से लाहोर की गद्दी छीन ली और वह भारत के हिन्दू क्षेत्रों में प्रवेश की तैयारी करने लगा। 1191 में उन्हें पृथ्वी राज तूत्य के नेतृत्व में राजपूतों की मिलीजुली सेना ने जिसे कन्नौज और बनारस वर्तमान में वाराणसी के राजा जयचंद का भी समर्थन प्राप्त था। अपने साम्राज्य के विस्तार और सुव्यवस्था पर पृथ्वीराज चौहान की पैनी दृष्टि हमेशा जमी रहती थी। अब उनकी इच्छा पंजाब तक विस्तार करने की थी। किन्तु उस समय पंजाब पर मोहम्मद गौरी का राज था। 1190 ई० तक सम्पूर्ण पंजाब पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो चुका था। अब वह भटिंडा से अपना राजकाज चलता था। पृथ्वीराज यह बात भली भांति जानता था कि मोहम्मद ग़ौरी से युद्ध किये बिना पंजाब में चौहान साम्राज्य स्थापित करना असंभव था। यही विचार कर उसने गौरी से निपटने का निर्णय लिया। अपने इस निर्णय को मूर्त रूप देने के लिए पृथ्वीराज एक विशाल सेना लेकर पंजाब की और रवाना हो गया। तीव्र कार्यवाही करते हुए उसने हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलों पर अपना अधिकार कर लिया। इसी बीच उसे सूचना मिली कि अनहीलवाडा में विद्रोहियों ने उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। पंजाब से वह अनहीलवाडा की और चल पड़े। उनके पीठ पीछे गौरी ने आक्रमण करके सरहिंद के किले को पुन: अपने कब्जे में ले लिया। पृथ्वीराज ने शीघ्र ही अनहीलवाडा के विद्रोह को कुचल दिया। अब उसने गौरी से निर्णायक युद्ध करने का निर्णय लिया। उसने अपनी सेना को नए ढंग से सुसज्जित किया और युद्ध के लिए चल दिया। रावी नदी के तट पर पृथ्वीराज के सेनापति समर सिंह और गौरी की सेना में भयंकर युद्ध हुआ परन्तु कुछ परिणाम नहीं निकला। यह देख कर पृथ्वीराज गौरी को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ा। थानेश्वर से १४ मील दूर और सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर यह युद्ध लड़ा गया। तराइन के इस पहले युद्ध में राजपूतों ने गौरी की सेना के छक्के छुड़ा दिए। गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे। जो भाग गया उसके प्राण बच गए, किन्तु जो सामने आया उसे गाजर-मूली की तरह काट डाला गया। सुल्तान मुहम्मद गौरी युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ। अपने ऊँचे तुर्की घोड़े से वह घायल अवस्था में गिरने ही वाला था की युद्ध कर रहे एक उसके सैनिक की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने बड़ी फुर्ती के साथ सुल्तान के घोड़े की कमान संभाल ली और कूद कर गौरी के घोड़े पर चढ़ गया और घायल गौरी को युद्ध के मैदान से निकाल कर ले गया। नेतृत्वविहीन सुल्तान की सेना में खलबली मच चुकी थी। तुर्क सैनिक राजपूत सेना के सामने भाग खड़े हुए। पृथ्वीराज की सेना ने 80 मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया। पर तुर्क सेना ने वापस आने की हिम्मत नहीं की। इस विजय से पृथ्वीराज चौहान को 7 करोड़ रुपये की धन सम्पदा प्राप्त हुई। इस धन सम्पदा को उसने अपने बहादुर सैनिको में बाँट दिया। इस विजय से सम्पूर्ण भारतवर्ष में पृथ्वीराज की धाक जम गयी और उनकी वीरता, धीरता और साहस की कहानी सुनाई जाने लगी।
be cont.........बाकी का भाग-२ मे...... Click   पृथ्वीराज चौहान Part -2


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