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सनातन राज

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भागवत गीता का ऐसा गणित कि आप देखकर चकित रह जाएगे........

भागवत गीता जैसा ग्यान पूरे विश्व मे कही नही मिलता भागवत गीता को आप जितनी वार..................................

*क्षत्रियो के प्रति दुनिया का विचार===============

मुगल अकबर की जुबान से :-* क्षत्रियो को हराना है तो उसे दोस्त बना लो क्योंकि दोस्ती/विश्वास के अलावा क्षत्रियो को जीतने या मारने का कोई तरीका नहीं हैं। { विजय नगर साम्राज्य से युद्ध के बाद }

रविवार, 10 दिसंबर 2017

अगर पर्स में रख ली ये तस्वीर तो हो जाओगे मालामाल

ज्योतिष शास्त्र : ज्योतिष के अनुसार अगर पर्स में यदि कुछ ख़ास चीजें राखी जाएँ तो इससे ना सिर्फ बरकत बढती है साथ ही शुभ फल भी प्राप्त होते हैं।और यदि पर्स में कुछ ऐसी चीजें राखी जाएँ जिससे नेगेटिव एनर्जी आती है तो इससे नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है। आज हम आपको बता रहे हैं की पर्स में क्या रखना चाहिए और क्यूँ । पर्स क्या रखना चाहिए, इसकी जानकारी इस पारकर है-
माँ लक्ष्मी की तस्वीर :
यदि आप अपने परस में माँ लक्ष्मी का फोटो रखते हैं तो इसका फल प्राप्त होता है। पर्स में माँ लक्ष्मी का फोटो रखने से बरकत बनी रहती है और परस कभी खली नहीं होता लेकिन एक बात का हमेशा ध्यान रखें की जैसे ही माँ लक्ष्मी का फोटो खंडित या खराब हो उसे तुरंत बदल दें। खंडित हुई फोटो नदी में पर्वाहित कर दें।

पीपल का अभिमंत्रित पत्ता :
आप अपने पर्स में पीपल का अभिमंत्रित पत्ता रख सकते हैं। धर्म ग्रंथो के अनुसार पीपल में भगवान् विष्णु का वास माना जाता है। इसका पत्ता पर्स में रखने से सकरात्मक उर्जा का एहसास होता है। पीपल के पत्ते को अभिमंत्रित करने के लिए कोई शुभ मुहूर्त देखकर पीपल के पेड़ का एक पत्ता तोड़ लायें। इस पत्ते को गंगाजल से धोकर पवित्र कर लें। अब इस पर केसर से श्री लिखें और इसे अपने परस में इस पारकर रखें की यह किसी को नज़र ना आये। नियमित अन्तराल पर इस पत्ते को बदलते रहे । पुराना पत्ता नदी में पर्वाहित कर दें और नया पत्ता अभिमंत्रित कर पर्स में रख लें।

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श्री यंत्र :
माँ लक्ष्मी की कुपा के लिए आप अपने पर्स में छोटे आकार का श्रीयंत्र भी रख सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र में श्रीयंत्र को माता लक्ष्मी का ही सवरूप माना जाता है।इस यंत्र की महिमा कई धर्म ग्रंथो में बताई गयी है। पर्स में रखने से पहले इसका विधि-विधान पूर्वक पूजा अवश्य करनी चाहिए। श्रीयंत्र की तरह ही लक्ष्मी यंत्र व् महालक्ष्मी यंत्र भी बहुत ही शुभ फल देने वाले माने गए हैं। यदि श्रीयंत्र न हो तो इनमे से कोई एक छोटे आकार का यंत्र आप अपने पर्स में रख सकते हैं। ये यंत्र सुख-समृधि परधन करने वाले तथा जीवन में उन्नति प्रदान करने वाले माने गए हैं। ये लेख पड़ने के लिए धन्यबाद और नयी जानकारी के लिए कुपया निचे और उपर दिए फॉलो के बटन को क्लिक कर इस न्यूज़ वेबसाइट को फॉलो करें धन्यबाद आपका दिन शुभ रहे।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

The MYSTERY of the Tantrik Bawdi | एक तांत्रिक का श्राप आज भी मौजूद है इस बावड़ी के पानी में

5 ऐसे जानवर जिन्हें भगवान् ने नहीं इंसान ने बनाया | 5 Animal Create by Human Not God

हमारी पृथ्वी पर अनेको प्रकार के जीव जंतु रहते है ! जिनकी संख्या का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है ! ??? आगे की जानकारी निचे देये में आपको मिलेगी..............

5 ऐसे जानवर जिन्हें भगवान् ने नहीं इंसान ने बनाया | 5 Animal Create by Human Not God

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क्या पद्मावती फिल्म पर रोक लगनी चाहिए



क्या पद्मावती फिल्म पर रोक लगनी चाहिए

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

यहाँ है आधा शिव आधा पारवती रूप शिवलिंग भगवान् अर्धनारीश्वर शिवलिंग


हिमाचल प्रदेश की भूमि को देवभूमि कहा जाता है यहाँ पर बहुत से आस्था के केंदर बिद्यमान है हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के इन्दोरा उपमंडल में काठगढ़ महदेव का मंदिर स्थित है यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग ऐसे सवरूप में विद्यमान है जो दो भागों में बंटे हुए हैं अर्थात माँ पारवती और भगवान् शिव के दो विभिन्न रूपों को ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार इनके दोनों भागों के मध्य का अन्तेर घटता बढता रहता है ग्रीषम ऋतू में यह सवरूप दो भागो में बंट जाता है और शीत ऋतू में पुन एक रूप धरण कर लेता है

शिव पुराण की विदेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारम्भ में एक बार ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दिव्यास्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुत हो उठे ये भयंकर स्थिति देख शिव संह्सा वहां आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तम्ब के रूप में प्रकट हुए जिससे दोनों देवताओं के अस्त्र स्वंय ही शांत हो गए

ब्रह्मा और विष्णु दोनों उस स्तम्भ के आदि अंत का मूल जानने के लिए जुट गए विष्णु शुक्र का रूप धरकर पातळ गए मगर अंत ना पा सके ब्रह्मा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले मै स्तम्भ का अंत खोज लाया हूँ जिसके ऊपर ये केतकी का फूल है

ब्रह्मा का ये छल देखकर भगवान् शंकर वहां प्रकट हुए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए तब शंकर ने कहा आप दोनों सामान हो पर ब्रह्मा के कपट के कारण उनकी पूजा नहीं होगी तभी से ब्रह्मा की पूजा अर्चना नहीं की जाती जिस स्तम्भ में शिव प्रकट हुए थे उसी स्तम्भ के अंश के रूप में इसे काठगढ़ महादेव के रूप में पूजा जाने लगा


एतिहासिक महत्व विश्वविजेता सिकंदर ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब पंजाब पहुंचा तो परवेश से पूर्व मीरथल नामक स्थान में 5000 सैनिको को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी इस स्थान पर उसने देखा की एक फ़कीर शिवलिंग की पूजा में व्यस्त था

उसने फ़कीर से कहा की आप मेरे साथ यूनान चलें मैं आपको दुनिया का हर एश्वर्या दूंगा फ़कीर ने सिकंदर की बात को अनसुना करते हुए कहा की आप थोडा पिशे हट जाएँ और सूर्य का परकाश मेरे तक आने दें फ़कीर की इस बात से परभावित होकर सिकंदर ने टाइल पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई इस चारदीवारी के व्यास नदी की और अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए जो आज भी यहाँ पर स्थिक हैं

दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अन्तेर ग्रहों एंव नक्षत्रों के अनुसार घटता बढता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का मिलन हो जाता है ये पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले भूरे रंग का है शिव रूप में पूजे जाते इस शिवलिंग की उंचाई 7 से 8 फुट है जबकि माँ पार्वती के रूप में आराध्य हिस्सा 5 से 6 फुट ऊँचा है

भरत की प्रिय पूज्य स्थली मान्यता है की त्रेता युग में भगवान् राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकई देश यानी की आज के कश्मीर जाते थे तो रास्ते में पड़ते काठगढ़ महादेव के मंदिर में पूजा अर्चना किया करते थे

शिवरात्रि के त्यौहार पर पर्तेयक वर्ष यहाँ पर तीन दिव्सयी भरी मेला लगता है शिव और शक्ति के अर्धनारीश्वर सवरूप के दर्शन से मानव जीवन में आने वाले सभी पारिवारिक और मानसिक दुखों का अंत होता है
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बुधवार, 12 जुलाई 2017

Part- 2 पिशले भाग में आपने महाराणा के जीवन और हल्दीघाटी के युद्ध के बारे मे पड़ा अभी आप इसमें उनके जीवन अंतिम समय और कई महत्ब्पूर्ण युधो के बारे मे!

महाराणा की प्रतिज्ञा
प्रताप को अपने सरदारों की ओर से अभूतपूर्व समर्थन मिला। यद्यपि धन और उज्ज्वल भविष्य ने उनके सरदारों को काफ़ी प्रलोभन दिया, परन्तु किसी ने भी उनका साथ नहीं छोड़ा। जयमल के पुत्रों ने उनके कार्य के लिये अपना रक्त बहाया। पत्ता के वंशधरों ने भी ऐसा ही किया और सलूम्बर के कुल वालों ने भी चूण्डा की स्वामिभक्ति को जीवित रखा। इनकी वीरता और स्वार्थ-त्याग का वृत्तान्त मेवाड़ के इतिहास में अत्यन्त गौरवमय समझा जाता है। प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि वह 'माता के पवित्र दूध को कभी कलंकित नहीं करेंगे।' इस प्रतिज्ञा का पालन उन्होंने पूरी तरह से किया। कभी मैदानी प्रदेशों पर धावा मारकर जन-स्थानों को उजाड़ना तो कभी एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर भागना और इस विपत्ति काल में अपने परिवार का पर्वतीय कन्दमूल-फल द्वारा भरण-पोषण करना और अपने पुत्र अमर का जंगली जानवरों और जंगली लोगों के मध्य पालन करना, अत्यन्त कष्टप्राय कार्य था। इन सबके पीछे मूल मंत्र यही था कि बप्पा रावल का वंशज किसी शत्रु अथवा देशद्रोही के सम्मुख शीश झुकाये, यह असम्भव बात थी। क़ायरों के योग्य इस पापमय विचार से ही प्रताप का हृदय टुकड़े-टुकड़े हो जाता था। तातार वालों को अपनी बहन-बेटी समर्पण कर अनुग्रह प्राप्त करना, प्रताप को किसी भी दशा में स्वीकार्य न था। 'चित्तौड़ के उद्धार से पूर्व पात्र में भोजन, शैय्या पर शयन दोनों मेरे लिये वर्जित रहेंगे।' महाराणा की यह प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रही और जब वे (विक्रम संवत 1653 माघ शुक्ल 11) तारीख़ 29 जनवरी, सन 1597 ई. में परमधाम की यात्रा करने लगे, उनके परिजनों और सामन्तों ने वही प्रतिज्ञा करके उन्हें आश्वस्त किया। अरावली के कण-कण में महाराणा का जीवन-चरित्र अंकित है। शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और उत्पीड़ितों के लिये वह प्रकाश का काम देगा। चित्तौड़ की उस पवित्र भूमि में युगों तक मानव स्वराज्य एवं स्वधर्म का अमर सन्देश झंकृत होता रहेगा।

कमलमीर का युद्ध
विजय से प्रसन्न सलीम पहाड़ियों से लौट गया, क्योंकि वर्षा ऋतु के आगमन से आगे बढ़ना सम्भव न था। इससे प्रताप को कुछ राहत मिली। परन्तु कुछ समय बाद शत्रु पुनः चढ़ आया और प्रताप को एक बार पुनः पराजित होना पड़ा। तब प्रताप ने कमलमीर को अपना केन्द्र बनाया। मुग़ल सेनानायकों कोका और शाहबाज ख़ाँ ने इस स्थान को भी घेर लिया। प्रताप ने जमकर मुक़ाबला किया और तब तक इस स्थान को नहीं छोड़ा, जब तक पानी के विशाल स्रोत नोगन के कुँए का पानी विषाक्त नहीं कर दिया गया। ऐसे घृणित विश्वासघात का श्रेय आबू के देवड़ा सरदार को जाता है, जो इस समय अकबर के साथ मिला हुआ था। कमलमीर से प्रताप चावंड चले गए और सोनगरे सरदार भान ने अपनी मृत्यु तक कमलमीर की रक्षा की। कमलमीर के पतन के बाद राजा मानसिंह ने धरमेती और गोगुंडा के दुर्गों पर भी अधिकार कर लिया। इसी अवधि में मोहब्बत ख़ाँ ने उदयपुर पर अधिकार कर लिया और अमीशाह नामक एक मुग़ल शाहज़ादा ने चावंड और अगुणा पानोर के मध्यवर्ती क्षेत्र में पड़ाव डालकर यहाँ के भीलों से प्रताप को मिलने वाली सहायता रोक दी। फ़रीद ख़ाँ नामक एक अन्य मुग़ल सेनापति ने छप्पन पर आक्रमण किया और दक्षिण की तरफ़ से चावंड को घेर लिया। इस प्रकार प्रताप चारों तरफ़ से शत्रुओं से घिर गए और बचने की कोई उम्मीद न थी। वह रोज़ाना एक स्थान से दूसरे स्थान, एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी के गुप्त स्थानों में छिपते रहते और अवसर मिलने पर शत्रु पर आक्रमण करने से भी न चूकते। फ़रीद ने प्रताप को पकड़ने के लिए चारों तरफ़ अपने सैनिकों का जाल बिछा दिया था, परन्तु प्रताप की छापामार पद्धति ने असंख्य मुग़ल सैनिकों को मौत के घाट पहुँचा दिया। वर्षा ऋतु ने पहाड़ी नदियों और नालों को पानी से भर दिया, जिसकी वजह से आने जाने के मार्ग अवरुद्ध हो गए। परिणामस्वरूप मुग़लों के आक्रमण स्थगित हो गए।



अकबर द्वारा प्रशंसा
अकबर ने भी इन समाचारों को सुना और पता लगाने के लिए अपना एक गुप्तचर भेजा। वह किसी तरक़ीब से उस स्थान पर पहुँच गया, जहाँ राणा और उसके सरदार एक घने जंगल के मध्य एक वृक्ष के नीचे घास पर बैठे भोजन कर रहे थे। खाने में जंगली फल, पत्तियाँ और जड़ें थीं। परन्तु सभी लोग उस खाने को उसी उत्साह के साथ खा रहे थे, जिस प्रकार कोई राजभवन में बने भोजन को प्रसन्नता और उमंग के साथ खाता हो। गुप्तचर ने किसी चेहरे पर उदासी और चिन्ता नहीं देखी। उसने वापस आकर अकबर को पूरा वृत्तान्त सुनाया। सुनकर अकबर का हृदय भी पसीज गया और प्रताप के प्रति उसमें मानवीय भावना जागृत हुई। उसने अपने दरबार के अनेक सरदारों से प्रताप के तप, त्याग और बलिदान की प्रशंसा की। अकबर के विश्वासपात्र सरदार अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना ने भी अकबर के मुख से प्रताप की प्रशंसा सुनी थी। उसने अपनी भाषा में लिखा, "इस संसार में सभी नाशवान हैं। राज्य और धन किसी भी समय नष्ट हो सकता है, परन्तु महान व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट नहीं हो सकती। पुत्तों ने धन और भूमि को छोड़ दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया। हिन्द के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है।"
परन्तु कभी-कभी ऐसे अवसर आ उपस्थित होते थे, जब अपने प्राणों से भी प्यारे लोगों को भयानक आवाज़ से ग्रस्त देखकर वह भयभीत हो उठते थे। उनकी पत्नी किसी पहाड़ी या गुफ़ा में भी असुरक्षित थी और उसके उत्तराधिकारी, जिन्हें हर प्रकार की सुविधाओं का अधिकार था, भूख से बिलखते उनके पास आकर रोने लगते। मुग़ल सैनिक इस प्रकार उनके पीछे पड़ गए थे कि भोजन तैयार होने पर कभी-कभी खाने का अवसर भी नहीं मिल पाता था और सुरक्षा के लिए भोजन छोड़कर भागना पड़ता था। एक दिन तो पाँच बार भोजन पकाया गया और हर बार भोजन को छोड़कर भागना पड़ा। एक अवसर पर प्रताप की पत्नी और उनकी पुत्रवधु ने घास के बीजों को पीसकर कुछ रोटियाँ बनाईं। उनमें से आधी रोटियाँ बच्चों को दे दी गईं और बची हुई आधी रोटियाँ दूसरे दिन के लिए रख दी गईं। इसी समय प्रताप को अपनी लड़की की चिल्लाहट सुनाई दी। एक जंगली बिल्ली लड़की के हाथ से उसके हिस्से की रोटी को छीनकर भाग गई और भूख से व्याकुल लड़की के आँसू टपक आये। जीवन की इस दुरावस्था को देखकर राणा का हृदय एक बार विचलित हो उठा। अधीर होकर उन्होंने ऐसे राज्याधिकार को धिक्कारा, जिसकी वज़ह से जीवन में ऐसे करुण दृश्य देखने पड़े और उसी अवस्था में अपनी कठिनाइयों को दूर करने के लिए उन्होंने एक पत्र के द्वारा अकबर से मिलने की इच्छा प्रकट की।

भामाशाह का सम्पत्ति दान
पृथ्वीराज का पत्र पढ़ने के बाद राणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान की रक्षा करने का निर्णय कर लिया। परन्तु मौजूदा परिस्थितियों में पर्वतीय स्थानों में रहते हुए मुग़लों का प्रतिरोध करना सम्भव न था। अतः उन्होंने रक्तरंजित चित्तौड़ और मेवाड़ को छोड़कर किसी दूरवर्ती स्थान पर जाने का विचार किया। उन्होंने तैयारियाँ शुरू कीं। सभी सरदार भी प्रताप के साथ चलने को तैयार हो गए। चित्तौड़ के उद्धार की आशा अब उनके हृदय से जाती रही थी। अतः प्रताप ने सिंध नदी के किनारे पर स्थित सोगदी राज्य की तरफ़ बढ़ने की योजना बनाई, ताकि बीच का मरुस्थल उनके शत्रु को उनसे दूर रखे। अरावली को पार कर जब राणा प्रताप मरुस्थल के किनारे पहुँचे ही थे कि एक आश्चर्यजनक घटना ने उन्हें पुनः वापस लौटने के लिए विवश कर दिया। मेवाड़ के वृद्ध मंत्री भामाशाह ने अपने जीवन में काफ़ी सम्पत्ति अर्जित की थी। वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ प्रताप की सेवा में आ उपस्थित हुआ और उसने राणा प्रताप से मेवाड़ के उद्धार की याचना की। यह सम्पत्ति इतनी अधिक थी कि उससे वर्षों तक 25,000 सैनिकों का खर्चा पूरा किया जा सकता था। भामाशाह का नाम मेवाड़ के उद्धारकर्ताओं के रूप में आज भी सुरक्षित है। भामाशाह के इस अपूर्व त्याग से प्रताप की शक्तियाँ फिर से जागृत हो उठीं।
दुर्गों पर अधिकार


युद्धभूमि पर महाराणा प्रताप के चेतक (घोड़े) की मौत
महाराणा प्रताप ने वापस आकर राजपूतों की एक अच्छी सेना बना ली, जबकि उनके शत्रुओं को इसकी भनक भी नहीं मिल पाई। ऐसे में प्रताप ने मुग़ल सेनापति शाहबाज़ ख़ाँ को देवीर नामक स्थान पर अचानक आ घेरा। मुग़लों ने जमकर सामना किया, परन्तु वे परास्त हुए। बहुत से मुग़ल मारे गए और बाक़ी पास की छावनी की ओर भागे। राजपूतों ने आमेर तक उनका पीछा किया और उस मुग़ल छावनी के अधिकांश सैनिकों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इसी समय कमलमीर पर आक्रमण किया गया और वहाँ का सेनानायक अब्दुल्ला मारा गया और दुर्ग पर प्रताप का अधिकार हो गया। थोड़े ही दिनों में एक के बाद एक करके बत्तीस दुर्गों पर अधिकार कर लिया गया और दुर्गों में नियुक्त मुग़ल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। संवत 1586 (1530 ई.) में चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर प्रताप ने अपना पुनः अधिकार जमा लिया। राजा मानसिंह को उसके देशद्रोह का बदला देने के लिए प्रताप ने आमेर राज्य के समृद्ध नगर मालपुरा को लूटकर नष्ट कर दिया। उसके बाद प्रताप उदयपुर की तरफ़ बढ़े। मुग़ल सेना बिना युद्ध लड़े ही वहाँ से चली गई और उदयपुर पर प्रताप का अधिकार हो गया। अकबर ने थोड़े समय के लिए युद्ध बन्द कर दिया।
सम्पूर्ण जीवन युद्ध करके और भयानक कठिनाइयों का सामना करके राणा प्रताप ने जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया, उसकी प्रशंसा इस संसार से मिट न सकेगी। परन्तु इन सबके परिणामस्वरूप प्रताप में समय से पहले ही बुढ़ापा आ गया। उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अन्त तक निभाया। राजमहलों को छोड़कर प्रताप ने पिछोला तालाब के निकट अपने लिए कुछ झोपड़ियाँ बनवाई थीं ताकि वर्षा में आश्रय लिया जा सके। इन्हीं झोपड़ियों में प्रताप ने सपरिवार अपना जीवन व्यतीत किया। अब जीवन का अन्तिम समय आ पहुँचा था। प्रताप ने चित्तौड़ के उद्धार की प्रतिज्ञा की थी, परन्तु उसमें सफलता न मिली। फिर भी, उन्होंने अपनी थोड़ी सी सेना की सहायता से मुग़लों की विशाल सेना को इतना अधिक परेशान किया कि अन्त में अकबर को युद्ध बन्द कर देना पड़ा।
अंत समय
अकबर के युद्ध बन्द कर देने से महाराणा प्रताप को बड़ा दुःख हुआ। कठोर उद्यम और परिश्रम सहन कर उन्होंने हज़ारों कष्ट उठाये थे, परन्तु शत्रुओं से चित्तौड़ का उद्धार न कर सके। वे एकाग्रचित्त से चित्तौड़ के उस ऊँचे परकोटे और जयस्तम्भों को निहारा करते थे और अनेक विचार उठकर हृदय को डाँवाडोल कर देते थे। ऐसे में ही एक दिन प्रताप एक साधारण कुटी में लेटे हुए काल की कठोर आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके चारों तरफ़ उनके विश्वासी सरदार बैठे हुए थे। तभी प्रताप ने एक लम्बी साँस ली। सलूम्बर के सामंन्त ने कातर होकर पूछा, "महाराज! ऐसे कौन से दारुण दुःख ने आपको दुःखित कर रखा है और अन्तिम समय में आपकी शान्ति को भंग कर रहा है।" प्रताप का उत्तर था, "सरदार जी! अभी तक प्राण अटके हुए हैं, केवल एक ही आश्वासन की वाणी सुनकर यह अभी सुखपूर्वक देह को छोड़ जायेगा। यह वाणी आप ही के पास है। आप सब लोग मेरे सम्मुख प्रतिज्ञा करें कि जीवित रहते अपनी मातृभूमि किसी भी भाँति तुर्कों के हाथों में नहीं सौंपेंगे। पुत्र राणा अमर सिंह हमारे पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा। वह मुग़लों के ग्रास से मातृभूमि को नहीं बचा सकेगा। वह विलासी है, वह कष्ट नहीं झेल सकेगा।"
निधन
राणा प्रताप ने अपने सरदारों को अमरसिंह की बातें सुनाते हुए कहा, "एक दिन इस नीचि कुटिया में प्रवेश करते समय अमरसिंह अपने सिर से पगड़ी उतारना भूल गया था। द्वार के एक बाँस से टकराकर उसकी पगड़ी नीचे गिर गई। दूसरे दिन उसने मुझसे कहा कि यहाँ पर बड़े-बड़े महल बनवा दीजिए।" कुछ क्षण चुप रहकर प्रताप ने कहा, "इन कुटियों के स्थान पर बड़े-बड़े रमणीक महल बनेंगे, मेवाड़ की दुरावस्था भूलकर अमरसिंह यहाँ पर अनेक प्रकार के भोग-विलास करेगा। अमर के विलासी होने पर मातृभूमि की वह स्वाधीनता जाती रहेगी, जिसके लिए मैंने बराबर पच्चीस वर्ष तक कष्ट उठाए, सभी भाँति की सुख-सुविधाओं को छोड़ा। वह इस गौरव की रक्षा न कर सकेगा और तुम लोग-तुम सब उसके अनर्थकारी उदाहरण का अनुसरण करके मेवाड़ के पवित्र यश में कलंक लगा लोगे।" प्रताप का वाक्य पूरा होते ही समस्त सरदारों ने उनसे कहा, "महाराज! हम लोग बप्पा रावल के पवित्र सिंहासन की शपथ करते हैं कि जब तक हम में से एक भी जीवित रहेगा, उस दिन तक कोई तुर्क मेवाड़ की भूमि पर अधिकार न कर सकेगा। जब तक मेवाड़ भूमि की पूर्व-स्वाधीनता का पूरी तरह उद्धार हो नहीं जायेगा, तब तक हम लोग इन्हीं कुटियों में निवास करेंगे।" इस संतोषजनक वाणी को सुनते ही प्रताप के प्राण निकल गए। यह 29 जनवरी, 1597 ई. का दिन था।[16]
इस प्रकार एक ऐसे राजपूत के जीवन का अवसान हो गया, जिसकी स्मृति आज भी प्रत्येक सिसोदिया को प्रेरित कर रही है। इस संसार में जितने दिनों तक वीरता का आदर रहेगा, उतने ही दिन तक राणा प्रताप की वीरता, माहात्म्य और गौरव संसार के नेत्रों के सामने अचल भाव से विराजमान रहेगा। उतने दिन तक वह 'हल्दीघाट मेवाड़ की थर्मोपोली' और उसके अंतर्गत देवीर क्षेत्र 'मेवाड़ का मैराथन' नाम से पुकारा जाया करेगा।
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महाराणा प्रताप जिनका नाम तक सून कांपता था अकबर जिन्होने अपने जिवन मे बहादूरी के साथ साथ आदर्शों को भी पूरी जगह दी आईए आज जानते है उनके वारे मे रोचक बाते!





















शासन:- 1 मार्च 1572 से 29 जनवरी 1597
                          ( 24 साल 327 दिन )
राज तिलक :-1 मार्च 1572
पूरा नाम :-महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया
पूर्वाधिकारी :-उदय सिंह द्वितीय
उत्तराधिकारी :-महाराणा अमर सिंह[1]
जीवन संगी :-(11 पत्नियाँ)[2]
संतान :-अमर सिंह,भगवान दास(17 पुत्र)
राज घराना :-सिसोदिया
पिता :-उदय सिंह द्वितीय
माता :-महाराणी जयवंता कँवर[2]
धर्म :-सनातन धर्म हिंदू
पूर्वाधिकारी:- उदय सिंह द्वितीय
उत्तराधिकारी :-महाराणा अमर सिंह
मृत्यु:-   29 जनवरी 1597
महाराणा प्रताप के नाम से भारतीय इतिहास गुंजायमान है। यह एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने मुगलों को छटी का दूध याद दिला दिया था। इनकी वीरता की कथा से भारत की भूमि गौरवान्वित है। महाराणा प्रताप मेवाड़ की प्रजा के राजा थे। वर्तमान में यह क्षेत्र राजस्थान में आता है। प्रताप राजपूतों में सिसोदिया वंश के वंशज थे। राणा प्रताप एक बहादुर राजपूत थे जिन्होंने हर परिस्थिती में अपनी आखरी सांस तक अपनी प्रजा की रक्षा की। इन्होंने सदैव अपने एवं अपने परिवार से उपर प्रजा को मान और सम्मान दिया। महाराणा प्रताप एक ऐसे शासक थे जिनकी वीरता को अकबर भी सलाम करता था। महाराणा प्रताप युद्ध कौशल में तो निपूण थे ही साथ ही वे एक भावुक एवं धर्म परायण भी थे। उनकी सबसे पहली गुरु उनकी माता जयवंता बाई जी थी। महाराणा प्रताप के पिता का नाम राणा उदय सिंह था। इनकी शादी महारानी अजबदे पुनवार से हुई थी। महाराणा प्रताप और अजबेद के पुत्रों का नाम अमर सिंह और भगवान दास था। अजबदे प्रताप की पहली पत्नी थी, इसके आलावा इनकी 11 पत्नियाँ और भी थी। प्रताप के कुल 17 पुत्र एवम 5 पुत्रियां थी। जिनमे अमर सिंह सबसे बड़े थे। वे अजबदे के पुत्र थे। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 और मृत्य 29 जनवरी 1597 को हुई थी। महाराणा प्रताप के मृत्यु के बाद अमर सिंह ने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली थी।
 जन्म
राजस्थान के कुम्भलगढ़ में राणा प्रताप का जन्म सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदयसिंह एवं माता रानी जीवत कँवर के घर 9 मई, 1540 ई. को हुआ था। रानी जीवत कँवर का नाम कहीं-कहीं जैवन्ताबाई भी उल्लेखित किया गया है।
प्रताप सिंह के काल में दिल्ली पर मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था। हिन्दू राजाओं की शक्ति का उपयोग कर दूसरे हिन्दू राजाओं को अपने नियंत्रण में लाना, यह मुग़लों की नीति थी। अपनी मृत्यु से पहले राणा उदयसिंह ने अपनी सबसे छोटी पत्नी के बेटे जगमल को राजा घोषित किया, जबकि प्रताप सिंह जगमल से बड़े थे। प्रताप सिंह अपने छोटे भाई के लिए अपना अधिकार छोड़कर मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे, किंतु सभी सरदार राजा के निर्णय से सहमत नहीं हुए। अत: सबने मिलकर यह निर्णय लिया कि जगमल को सिंहासन का त्याग करना पड़ेगा। प्रताप सिंह ने भी सभी सरदार तथा लोगों की इच्छा का आदर करते हुए मेवाड़ की जनता का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार किया। इस प्रकार बप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण कीर्ति की उज्ज्वल पताका, राजपूतों की आन एवं शौर्य का पुण्य प्रतीक, राणा साँगा का यह पावन पौत्र (विक्रम संवत 1628 फाल्गुन शुक्ल 15) तारीख़ 1 मार्च सन 1573 ई. को सिंहासनासीन हुआ।
उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सड़क से कुछ दूर हटकर पहाड़ियों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास प्रसिद्ध वह स्थान है, जहाँ 1576 ई. में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। इस स्थान को 'गोगंदा' भी कहा जाता है। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुग़ल बादशाह की मैत्रीपूर्ण दासता पसन्द न थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसके फलस्वरूप मानसिंह के भड़काने से अकबर ने स्वयं मानसिंह और सलीम (जहाँगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी। 'हल्दीघाटी की लड़ाई' 18 जून, 1576 ई. को हुई थी। राजपूताने की पावन बलिदान-भूमि के समकक्ष, विश्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं है। उस शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर बलिदान राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास और वीरकाव्य का परम उपजीव्य है।

मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 विक्रमी में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया। अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े-से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक, जिसने उन्हें निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ा।

दिल्ली का उत्तराधिकारी जहाँगीर मुग़ल सेना के साथ युद्ध के लिए चढ़ आया था। उसके साथ राजा मानसिंह और सागरजी का जातिभ्रष्ट पुत्र मोहबत ख़ाँ भी था। प्रताप ने अपने पर्वतों और बाईस हज़ार राजपूतों में विश्वास रखते हुए अकबर के पुत्र का सामना किया। अरावली के पश्चिम छोर तक शाही सेना को किसी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा, परन्तु इसके आगे का मार्ग प्रताप के नियन्त्रण में था।

प्रताप अपनी नई राजधानी के पश्चिम की ओर पहाड़ियों में आ डटे। इस इलाक़े की लम्बाई लगभग 80 मील (लगभग 128 कि.मी.) थी और इतनी ही चौड़ाई थी। सारा इलाक़ा पर्वतों और वनों से घिरा हुआ था। बीच-बीच में कई छोटी-छोटी नदियाँ बहती थीं। राजधानी की तरफ़ जाने वाले मार्ग इतने तंग और दुर्गम थे कि बड़ी कठिनाई से दो गाड़ियाँ आ-जा सकती थीं। उस स्थान का नाम हल्दीघाटी था, जिसके द्वार पर खड़े पर्वत को लाँघकर उसमें प्रवेश करना संकट को मोल लेना था। प्रताप के साथ विश्वासी भील लोग भी धनुष और बाण लेकर डट गए। भीलों के पास बड़े-बड़े पत्थरों के ढेर पड़े थे। जैसे ही शत्रु सामने से आयेगा, वैसे ही पत्थरों को लुढ़काकर उनके सिर को तोड़ने की योजना थी।
हल्दीघाटी के इस प्रवेश द्वार पर अपने चुने हुए सैनिकों के साथ राणा प्रताप शत्रु की प्रतीक्षा करने लगे। दोनों ओर की सेनाओं का सामना होते ही भीषण रूप से युद्ध शुरू हो गया और दोनों तरफ़ के शूरवीर योद्धा घायल होकर ज़मीन पर गिरने लगे। प्रताप अपने घोड़े पर सवार होकर द्रुतगति से शत्रु की सेना के भीतर पहुँच गये और राजपूतों के शत्रु मानसिंह को खोजने लगे। वह तो नहीं मिला, परन्तु प्रताप उस जगह पर पहुँच गये, जहाँ पर 'सलीम' (जहाँगीर) अपने हाथी पर बैठा हुआ था। प्रताप की तलवार से सलीम के कई अंगरक्षक मारे गए और यदि प्रताप के भाले और सलीम के बीच में लोहे की मोटी चादर वाला हौदा नहीं होता तो अकबर अपने उत्तराधिकारी से हाथ धो बैठता। प्रताप के घोड़े चेतक ने अपने स्वामी की इच्छा को भाँपकर पूरा प्रयास किया। तमाम ऐतिहासिक चित्रों में सलीम के हाथी की सूँड़ पर चेतक का एक उठा हुआ पैर और प्रताप के भाले द्वारा महावत की छाती का छलनी होना अंकित किया गया है।[4] महावत के मारे जाने पर घायल हाथी सलीम सहित युद्ध भूमि से भाग खड़ा हुआ।

राजपूतों का बलिदान
इस समय युद्ध अत्यन्त भयानक हो उठा था। सलीम पर राणा प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर चारों तरफ़ से प्रहार करने लगे। प्रताप के सिर पर मेवाड़ का राजमुकुट लगा हुआ था। इसलिए मुग़ल सैनिक उन्हीं को निशाना बनाकर वार कर रहे थे। राजपूत सैनिक भी प्रताप को बचाने के लिए प्राण हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे-धीरे प्रताप संकट में फँसते जा रहे थे। स्थिति की गम्भीरता को परखकर झाला सरदार ने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के साथ आगे बढ़ा और प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने सिर पर रख लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और प्रताप को युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल गया। उनका सारा शरीर अगणित घावों से लहूलुहान हो चुका था। युद्धभूमि से जाते-जाते प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा। राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुग़लों का मुक़ाबला किया, परन्तु मैदानी तोपों तथा बन्दूकधारियों से सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित बाईस हज़ार राजपूत सैनिकों में से केवल आठ हज़ार जीवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाये।
राणा प्रताप और चेतक
महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था। हल्दीघाटी के युद्ध में घायल होने के बाद वे बिना किसी सहायक के अपने पराक्रमी चेतक पर सवार होकर पहाड़ की ओर चल पड़े। उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को बचा लिया। रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। घायल चेतक फुर्ती से उसे लाँघ गया, परन्तु मुग़ल उसे पार न कर पाये। चेतक नाला तो लाँघ गया, पर अब उसकी गति धीरे-धीरे कम होती गई और पीछे से मुग़लों के घोड़ों की टापें भी सुनाई पड़ीं। उसी समय प्रताप को अपनी मातृभाषा में आवाज़ सुनाई पड़ी- "हो, नीला घोड़ा रा असवार।" प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा तो उन्हें एक ही अश्वारोही दिखाई पड़ा और वह था, उनका भाई शक्तिसिंह। प्रताप के साथ व्यक्तिगत विरोध ने उसे देशद्रोही बनाकर अकबर का सेवक बना दिया था और युद्धस्थल पर वह मुग़ल पक्ष की तरफ़ से लड़ रहा था। जब उसने नीले घोड़े को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ़ जाते हुए देखा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा, परन्तु केवल दोनों मुग़लों को यमलोक पहुँचाने के लिए।

शक्तिसिंह द्वारा राणा प्रताप की सुरक्षा
जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले मिले। इस बीच चेतक ज़मीन पर गिर पड़ा और जब प्रताप उसकी काठी को खोलकर अपने भाई द्वारा प्रस्तुत घोड़े पर रख रहे थे, चेतक ने प्राण त्याग दिए। बाद में उस स्थान पर एक चबूतरा खड़ा किया गया, जो आज तक उस स्थान को इंगित करता है, जहाँ पर चेतक मरा था। प्रताप को विदा करके शक्तिसिंह खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार होकर वापस लौट आया। सलीम को उस पर कुछ सन्देह पैदा हुआ। जब शक्तिसिंह ने कहा कि प्रताप ने न केवल पीछा करने वाले दोनों मुग़ल सैनिकों को मार डाला अपितु मेरा घोड़ा भी छीन लिया। इसलिए मुझे खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार होकर आना पड़ा। सलीम ने वचन दिया कि अगर तुम सत्य बात कह दोगे तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा। तब शक्तिसिंह ने कहा, "मेरे भाई के कन्धों पर मेवाड़ राज्य का बोझा है। इस संकट के समय उसकी सहायता किए बिना मैं कैसे रह सकता था।" सलीम ने अपना वचन निभाया, परन्तु शक्तिसिंह को अपनी सेवा से हटा दिया।
राणा प्रताप की सेवा में पहुँचकर उन्हें अच्छी नज़र भेंट की जा सके, इस ध्येय से उसने भिनसोर नामक दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। उदयपुर पहुँचकर उस दुर्ग को भेंट में देते हुए शक्तिसिंह ने प्रताप का अभिवादन किया। प्रताप ने प्रसन्न होकर वह दुर्ग शक्तिसिंह को पुरस्कार में दे दिया। यह दुर्ग लम्बे समय तक उसके वंशजों के अधिकार में बना रहा।[5] संवत 1632 (जुलाई, 1576 ई.) के सावन मास की सप्तमी का दिन मेवाड़ के इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा। उस दिन मेवाड़ के अच्छे रुधिर ने हल्दीघाटी को सींचा था। प्रताप के अत्यन्त निकटवर्ती पाँच सौ कुटुम्बी और सम्बन्धी, ग्वालियर का भूतपूर्व राजा रामशाह और साढ़े तीन सौ तोमर वीरों के साथ रामशाह का बेटा खाण्डेराव मारा गया। स्वामिभक्त झाला मन्नाजी अपने डेढ़ सौ सरदारों सहित मारा गया और मेवाड़ के प्रत्येक घर ने बलिदान किया।
Part - 2 http://www.sanatanraj.com/2017/07/part-2.html
भाग -२ http://www.sanatanraj.com/2017/07/part-2.html

सावन के पवित्र महीने में शिवलिंग और नाग के ऐसे दर्शन नहीं किये होंगे विडियो

देवो के देव महादेव शिव शंकर की महिमा अपरम्पार है सावन के महीने में कई मंदिरों में अद्भुत चमत्कार देखने को मिलते है ऐसा ही मंदिर का विडियो जिसमे नाग देवता कैसे शिवलिंग के साथ विराजमान है वो आपको दिखाई देगा इस अद्भुत संगम को और चमत्कार को देखने लोग काशी आते है आप भी कीजिये दर्शन
सावन महिना सनातन हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है और हर सावन के सोमवार को शिव भक्त ब्रत रखते हैं माना जाता है की सावन महीने में भोलेनाथ भक्तों पर ज्यादा खुश होते है सावन में शिव मंदिरों भीड़ देखने लायक होती है भगवन  पवित्र कांवड़ यात्रा भी इसी सावन के महीने में ही होती है इस बार सावन महिना कुछ ख़ास है क्यूंकि इस बार सावन महिना सोमबार को शुरू होगा और सोमबार को ही खत्म होगा

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

जानिए श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुध्न के जन्म का समय, वार, तिथि, नक्षत्र


1— श्री राम जी का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व दोपहर बारह बजे हुआ । यदि इसे आधुनिक कलेंडर में बदलें तो (चैत्र मास ,शुक्लपक्ष ,तिथि नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न प्राप्त होता है ।) जिसे बाल्मीक जी ने अपनी रामायण में दर्शाया है।

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2–श्री भरत जी का जन्म 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व सुबह चार बजे हुआ। (पुष्प नक्षत्र, मीन लग्न,)

 महाभारत के प्राचीन शहर
                                                                                                                                                                
3–लक्ष्मण तथा शत्रुध्न का जन्म 11 जनवरी 5114 ईसा पूर्व ग्यारह बजकर तीस मिनट पे हुआ। ( अश्लेखा नक्षत्र, कर्क लग्न)

4–राम बडे थे भरत जी से 16 घन्टे ।

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5— राम बडे थे लखन और सत्रुघ्न से साढे तेइस घन्टे ।

6–भरत बडे थे लखन और सत्रुघ्न से साढे सात घन्टे ।
। जय श्री राम ।

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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

क्या आप जानते हैं हनुमान चालीसा की इस पंक्ति का रहस्य.....


सनातनी हिन्दू धर्म दुनिया का इकलौता ऐसा धर्म है जो धरती की शुरुवात से है उस वक़्त ये कोई धर्म नहीं था क्यूंकि जैसे अगर दुनिया में अगर कोई अकेला मनुष्य हो तो उसको नाम की जरुरत नहीं होगी वैसे सनातन धर्म को भी तब किसी नाम की जरुरत नहीं थी बाद में कुछ लोग सनातन ( पुराना ) कहने लगे कुछ आर्य कुछ भारतवंशी फिर जब दुनिया में कई धर्म उपजे..

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जैसे हिन्दू धर्म से उपजा बौद्ध धर्म ईसवी पूर्व 6वी सदी आज से तक़रीबन 2500 साल पहले

ईसाई धर्म पहली शताब्दी में आज से तक़रीबन 2000 साल पहले
 



इस्लाम धर्म सातवीं सदी में अरब में जन्मा आज से तक़रीबन 1400 साल पहले हुई जो हिन्दू धर्म और अखंड भारत के  लिए अभिशाप साबित हुआ जिसने सनातनी धर्म को और भारत को काफी आघात पहुँचाया उसी दौर में अपने को ख़तम होने से बचने के लिए हमारे धर्म को एक नाम मिला हिन्दू।
                                       
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हिन्दुइस्म के विषय पर मै राघव राजपूत  रिसर्च कर रहा हूँ उसपर भी मै एक ब्लॉग लिखूंगा कुछ दिन बाद.

                                    क्या आप जानते हैं हनुमान चालीसा की इस पंक्ति का रहस्य


                                                                 DOWNLOAD
आज हम बात करते है हनुमान जयंती पर हनुमान चालीसा के एक तथ्य के बारे में उन लोगो को जवाब देने के
लिए जो लोग हमारे धरम को अंधविश्वासी कहते है।



जुग सहस्र जौजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।
इस पंक्ति में धरती और सूर्य का बिलकुल सही  माप दिया गया है :-

युग - 12,000
सहस्र- 1,000
योजन - 8
इन सबको गुना करने पर मिलता है :-
9,60,00,000
यानि कि 9,60,00,000 मील
एक मील यानि 1.6 कि.मी
9,60,00,000 गुना यानि
15,36,00,000 कि.मी

विज्ञानको ने धरती से सूर्य की दुरी 18वी सदी में मालूम की जबकि तुलसीदास ने ये हनुमान चालीसा सदियों पहले
ही लिख दिया था।

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दोस्तों ये है हमारा सनातन हिन्दू धरम कुछ लोग हमारे धर्म को अंधविश्वासी धरम कहते है पर वो हमारे धरम के
सही पहलुओं को नहीं जानते सनातन हिन्दू धर्म के ग्रंथो पौराणिक कथाओ और ऋषि मुनियो ने हज़ारो बर्ष पहले ही इस धरती के बाहर क्या है अंतरिक्ष के ग्रहो के वारे में और आज के युग के बारे में ग्रंथो किताबो में लिख दिया था जिसको विज्ञानं ने 18वी सदी के बाद खोजा वो हमारे ग्रंथो में हज़ारो वर्ष पहले से ही लिखा हुआ है। जब दुनिया
अपना वजूद तलाश रही थी अपना नाम तक नहीं जानती थी तब हमारे देश में ऋषि मुनि अनेक खोजे किया करते
थे।  दुनिया का सबसे बड़ा और पहला विश्वविद्यालय तक्षिला विश्वविद्यालय जहा पूरी दुनिया से लोग सिखने आते थे
हमारे ही ऋषि मुनियो की खोज है। आज के युग में हम अपने ग्रंथो पर खुद ही विश्वास नहीं करते और हमारे धर्म के बारे में जो अफबाहे उस काल में | फैलाई गयी थी जब हमारा देश अंग्रेजो से पहले 1००० बर्ष से मुस्लिमो का गुलाम था मुस्लिमो ने हमारे धर्म को तोड़ने के लिए कई गद्दार हिन्दुओ का सहारा ले कई मनगढंत कहानिया रची जिसमे ३३ करोड़ देवी देवता या ब्रह्मा का अपनी बेटी से सहवास  जैसी झूठी कहानियां जिनका कोई भी जीकर हमारे ग्रंथो में नहीं है पर आज हिन्दू खुद विश्वास करता है।

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अधूरा ज्ञान खतरना होता है।

33 करोड नहीँ  33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख

हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...

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कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-

12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार है :-
रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है

तो इस जानकारी को अधिक से अधिक                                                
लोगो तक पहुचाएं। ।

इस विषय में अगर मुझसे कोई त्रुटि हो गयी हो तो कृपया निचे कमेंट में बताएं और अपनी राय दें





 ज़यादा जानकारी के लिए ये वीडियो देखें
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रविवार, 9 अप्रैल 2017

कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा - परदादा का नाम क्या था? नहीं तो जानिये-

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,                                

 दुनिया की सबसे भूतिया और रहस्मय जगह  
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2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए, 
                               
समंदर से जुड़े 10 अनसुलझे रहस्य।                         
 मक्का मदीना से जुड़ा अनसुना रहस्य

3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,        
            
15 रहस्यमयी ऐसे देश जो कभी थे भारत का हिस्सा      
                                    
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,



5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |            

6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,        
               
मृत्यु से पहले ये 10 संकेत देता है भगवान

8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,      
                    
भारत का एक रहस्मयी टापू जहाँ नहीं चलता किसी का राज

9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,                 

10- अनरण्य से पृथु हुए,

                                                      मक्का मदीना से जुड़ा अनसुना रहस्य

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11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,

12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,         

 इन न्यूज़ हेडलाइन्स को पढ़ने के बाद शायद आप अपनी हंसी न रो पाएं

13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,         

14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,

15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,      

  क्या आपने किये कैलाश पर्वत पर भागवान शिव के दर्शन नहीं तो....

16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,

17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,                      

   Kya Aap Janto Ho Maa Vaishno Devi Ki Ye Katha

18- भरत के पुत्र असित हुए,

19- असित के पुत्र सगर हुए,

20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,

                                                दुनिया की सबसे भूतिया और रहस्मय जगह

                                        

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21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,

22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,

23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |

24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |

25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,                     

  पाकिस्तान में स्थित एक ऐसा मंदिर यहाँ मुस्लिम भी झुकाते है सर |

26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,                     

27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए                        

  ध्यान न रखी जाएं ये 4 बातें तो व्यर्थ है आपका जप                  

28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,

29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,                                      

 महाभारत के प्राचीन शहर

30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,                                     

31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,

32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,     

 क्या आप जानते हैं हनुमान चालीसा की इस पंक्ति का रहस्य                 

33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,

34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,                          

35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,                 

How To Make Avtar Animation in Mobile 

36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,

37- अज के पुत्र दशरथ हुए,

38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी

(39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | 

यहाँ के लोग शव को आधा जला बापिस ले जाते है घर    


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🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹
                                 
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1:~मानस में राम शब्द = 1443 बार आया है।

2:~मानस में सीता शब्द = 147 बार आया है।

   VIDEO-योगी और ओवेसी की आमने सामने हुई तकरार राम मंदिर बनाने के लिए                                                   
3:~मानस में जानकी शब्द = 69 बार आया है।

4:~मानस में बैदेही शब्द = 51 बार आया है।

5:~मानस में बड़भागी शब्द = 58 बार आया है।
                                                
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6:~मानस में कोटि शब्द = 125 बार आया है।

7:~मानस में एक बार शब्द = 18 बार आया है।

8:~मानस में मन्दिर शब्द = 35 बार आया है।
                                                    
9:~मानस में मरम शब्द = 40 बार आया है।

10:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।             

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11:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।

12:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।       

 VIDEO-ऐसा दंगल पहले कभी नहीं देखा होगा |

13:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।

14:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।   

  आखिर क्यों रो पड़े थे योगी संसद में वायरल विडियो |

15:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।

16:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।         

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17:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।

18:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।

19:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।

 शिवरात्री के दिन शिवलिंग पर नाग ने की पूजा देखने के लिए

20:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।

21:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।

22:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।               

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23:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।

24:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।

कमजोर दिलवालों के लिए नहीं ये वीडियो कृप्या न देखें

25:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।              

26:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।  

5 ऐसी वेबसाइट जिनके बारे में आपने पहले सुना नहीं होगा

27:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।

28:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

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यह जानकारी  महीनों के परिश्रम केबाद आपके सम्मुख प्रस्तुत है ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
  हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

हँसते हँसते पागल हो जाओगे इन पिक्चर्स को देखकर

एक माँ ढूंढ रही थी बेटी के बैग में सामान तभी मिला वो

        एक बार यह विडियो जरूर देखना !


                                                                                                                                             

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